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संपादक परंपरा का हाल पवित्र नदियों मेंं प्रदूषण सरीखा

संपादक माने किसी अखबार का ब्रह‍मा या किसी शरीर का मस्तिष्क ऐसा माना जाता था, लेकिन आज के दौर में यह बात अतीत का एक संवाद भर रह गई है। आज का संपादक असल में मैनेजर की भूमिका में ज्यादा है, संपादन की भूमिका में काफी कम। यह अतिसंयोक्ति नहीं बल्कि दीवार पर लिखी इबारत और आइने की तरफ एकदम साफ है। यह बात में इतने स्पष्ट रूप से इसलिए कह रहा हूं कि जब मैंने 28 बरस पहले पत्रकारिता शुरू की थी और अब जब कि मेरे पदनाम के साथ भी संपादक शब्द किसी अन्य पुछल्ले की तरह एकाधिक बार लग चुका है। संपादक परंपरा: कल, आज और कल की बात मैंने आज की हकीकत के एक वास्तविक दृश्य से शुरू की है। अब हम विषय पर उसी क्रम में बात करें तो भारतीय पत्रकारिता में  भारत के पहले अखबार जेम्स  आगस्टस हिकी के हिकीज बंगाल गजट और पहले हिंदी अखबार उदंत्त मार्तंड के यशस्वी संपादक  युगल किशोर सुकुल से लेकर महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, मदनमोहन मालवीय, माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, विष्णु श्रीधर पराडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी तक और राहुल बारपुते, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर से लेकर दो ढाई दशक पहले तक के कई गुणी पत्रकार संपादकों तक यह श्रृंखला चली आती है। यह संयोग है या प्रभाव की नई आर्थिक नीति, वैश्वीकरण और बाजार के हावी होने के ढाई दशक के दौरान संपादक नामक पद जिसे पहले संस्था कहा जाता था, पद भी मैनेजर की तरह होने लगा। अब संपादक अखबारों या मीडिया संस्थानों में पत्रकारों की सालाना छंटनी के प्रमुख औजार बन गए हैं और इसमें निपुणता उनके संपादक पद पर बने रहने की काबिलियतों में से एक विशेषता बन चुकी है। मैं स्वयं बतौर पत्रकार 28 बरस के दौरान छह संस्थानों में काम कर चुका हूं और इनमें से एकाध को छोड़कर बाकी बहुसंस्करण वाले बड़े कहे जाने वाले अखबार रहे हैं। इस दौरान वाकई संपादक माने जा सकने वाले संपादकों के अलावा ऐसे संपादकों के साथ भी काम करना पड़ा जो इस पद मान्य रही परंपरा में कहीं भी फिट नहीं बैठते थे। एक संस्थान में एक संपादक का एक से दसरे संस्करण में तबादले के बाद उनकी औपचारिक विदाई पार्टी में दिया गया उनका इकबालिया सफलता की कुंजी का बयान काबिल गौर है और यह बताता है कि संपादक अब संपादक नहीं रहे। उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि वे इस संस्करण में संपादक बनकर आए थे, उस वक्त लिए गए तीन संकल्पों पर पूरे तीन साल अमल कर सके। उन्होंने बताया कि उन्होंने तय किया था कि वे किसी नेता, अफसर से नहीं मिलेंगे, वे सार्वजनिक कार्यक्रम यानी व्याख्यान इत्यादि में वक्ता या अतिथि, मुख्य अतिथि नहीं बनेंगे और तीसरा यह कि वे अखबार में कुछ लिखेंगे नहीं यानी संपादकीय या आलेख वगैरह। क्या अतीत में बिना लिखे संपादक बनने या कायम रहने की कल्पना की जा सकती थी। आज अखबारों में खासकर बड़े अखबारों में संपादक संपादकीय नहीं लिखते, वे उन लोगों से लिखवाए जाते हैं, जिन्हें पार्ट टाइमर या कंट्रीब्यूटर कहा जाता है। फिर संपादक क्या करते हैं? जो कंपनियों में मैनेजर करते हैं, वही संपादक करते हैं। वे दौरे करते हैं, मीटिंग्स करते हें, बड़ी मीटिंग्स में जाते हैं और जो प्रबंधन की नीति होती है उसे अपने संस्करण में लागू कराते हैं। वे पत्रकारों से मिलने से गुरेज करते हैं। राजनेताओं, अफसरों, साहित्यकारों या समाज के महत्वपूर्ण तबकों और उस शहर से जहां वे संपादक हैं, उससे सरोकार नहीं रखते। यह उनकी संपादक बने रहने की काबिलियत और लगातार पदोन्नत होते जाने की एक हद तक गारंटी मानी जाती है। यह किसी को अतिरेक लग रहा हो तो निवेदन है कि यह हकीकत है, इसे भी थोड़ा लिखा बहुत समझना की श्रेणी में ही मानें।                                                                           

अब बात आने वाले कल में संपादक की भूमिका की। तो यह सुनिश्चित है कि समाज और लोकतंत्र को वैसे ही संपादकों की जरूरत है जैसे कि होने ही चाहिए। वही संपादकीय लिखने वाले, तात्कालिक विषयों पर समाज को  विचार देने वाले आलेख लिखने वाले और पत्रकारों की टीम को वैसा ही मार्गदर्शन देने वाले जैसै पहले हुआ करते थे। आज भी भले ही कम संख्या में सही वैसे पत्रकार और संपादक मौजूद हैं और वे अपनी भूमिका सही तरीके से निभाने का प्रयास भी कर रहे हैं। अखबार, न्यूज चैनल्स, बेव मीडिया और यहां तक कि सोशल कहे जाने वाले मीडिया के कई प्लेटफार्म सामने हैं। ऐसे में विश्वसनीयता का संकट मीडिया के समूचे परिद़श्य में पसरा है, इस कुहासे को खत्म करने के लिए संपादक नामक संस्था की फिर वापसी पूरे तेवर के साथ होने की जरूरत है। हालात उसी दिशा में जा रहे हैं, जब पत्रकारिता का सूरज फिर तेजी से चमकने की जरूरत है। संपादक ही विश्वसनीयता को लौटा सकता है और मीडिया संस्थान संपादक के कारण जाने और भरोसे वाले बनेंगे, वह दौरान आना चाहिए, उम्मीद की जाना चाहिए कि ऐसा हो पाएगा।

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